शास्त्रों में संकल्प की महिमा
शास्त्रों के अनुसार बिना संकल्प के किया गया कर्म अपूर्ण माना जाता है।
संकल्प का अर्थ केवल इच्छा नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा का एकाग्र होकर किसी पवित्र उद्देश्य के लिए किया गया निश्चय है।
- वायव्य संहिता: "स्वयं कर्तुं अशक्तः स्वयेत् कुर्यात तत्पुरोधसा।"
- अर्थ: जो व्यक्ति स्वयं पूजा-अनुष्ठान नहीं कर सकता, वह संकल्प द्वारा इसे किसी योग्य ब्राह्मण से करवाए।
- मनुस्मृति 11.7: "यः स्वयं न कुर्याद धर्मं संकल्प्य तत्परं ददाति स धर्मं प्राप्नुयात्।"
- अर्थ: जो व्यक्ति संकल्प द्वारा धार्मिक कार्यों को किसी अन्य को सौंपता है, उसे उसी तरह पुण्य प्राप्त होता है जैसे उसने स्वयं किया हो।
- गरुड़ पुराण एवं महाभारत में भी संकल्प द्वारा धार्मिक कार्य करवाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।