
हमारा उद्देश्य उन लोगों को धार्मिक और आध्यात्मिक सहयोग प्रदान करना है, जो किसी कारणवश स्वयं अपने संकल्पों को पूरा नहीं कर सकते। ओम संकल्प एक संस्था ही नहीं बल्कि एक सेवा है, जिसके माध्यम से हम सभी धार्मिक कार्यों को संकल्प पद्धति के द्वारा आपके लिए संकल्पित व्यक्ति द्वारा पूर्ण करवाते हैं। हम सनातन धर्म की परंपराओं और धार्मिक संस्कारों को संरक्षित और प्रचारित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
हम मानते हैं कि मृत्यु केवल एक शारीरिक यात्रा का अंत नहीं, बल्कि आत्मा की नई यात्रा की शुरुआत होती है। हर व्यक्ति को सम्मानजनक अंतिम संस्कार और मोक्ष प्राप्त करने का अधिकार है।
हमारा संकल्प है कि कोई भी मृत व्यक्ति लावारिस न रहे और उसकी अंतिम यात्रा गरिमामय तरीके से पूरी हो।
“अंतिम सफर में भी कोई अकेला न रहे – यही हमारा संकल्प है!”
यदि प्रेतस्य कर्ता न स्याद् दायादो वा जनोऽपि वा।
राजा वा राजमात्यो वा स प्रेतकार्यं समाचरेत्॥
अर्थ: यदि मृत व्यक्ति का कोई कर्ता, दायाद या संबंधी न हो, तो राजा या समाज का प्रतिनिधि उसका अंतिम संस्कार करवाए।
संदर्भ: यह श्लोक समाज की जिम्मेदारी को दर्शाता है, जिसका आधुनिक स्वरूप ‘OMSankalp’ जैसी संस्थाएँ निभा रही हैं।
दत्त्वा चोद्दिश्य विधिवत् पितृभ्यः पिण्डदानतः।
अर्थ: संतान न होने पर भी यदि कोई श्रद्धापूर्वक पिंडदान करता है, तो पितरों को शुद्धि प्राप्त होती है।
संदर्भ: यह प्रमाणित करता है कि संकल्प के साथ कोई भी व्यक्ति पिंडदान कर सकता है।
यस्य नास्ति स्वयं श्रद्धा न च सन्ततिरेव च।
अर्थ: संतान न होने पर मित्र, शिष्य या कोई भी श्रद्धा से श्राद्ध कर्म कर सकता है।
संदर्भ: यह श्लोक संकल्प द्वारा किए गए श्राद्ध को पूर्ण मान्यता देता है।
अपुत्रस्य कृतं श्राद्धं सुतवत् फलदायकम्।
अर्थ: किसी भी शुभचित्त व्यक्ति द्वारा किया गया श्राद्ध पुत्र के समान फलदायक होता है।
धर्मः कर्तव्यो नृभिः सर्वदैव।
अर्थ: हर व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य अनुसार पितृ कर्म करना चाहिए।
पदयात्रा सनातन धर्म में केवल एक शारीरिक यात्रा नहीं, बल्कि मानसिक, आत्मिक और आध्यात्मिक शुद्धि की साधना मानी गई है। यह भक्ति, तपस्या और संकल्प का मार्ग है, जिसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों और महाकाव्यों में विस्तार से मिलता है।
ऋग्वेद (10.33.1):
"यत्र नार्यः पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।"
अर्थ: जहाँ श्रद्धा और भक्ति से धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, वहाँ देवताओं का वास होता है।
पदयात्रा एक ऐसा भक्ति मार्ग है, जिसमें व्यक्ति शरीर और मन दोनों से तप करता है और देवकृपा का पात्र बनता है।
छांदोग्य उपनिषद (8.5.4):
"तपोऽपि तप्येत, यत्र यत्र ध्यानं तत्सर्वं पवित्रं भवति।"
अर्थ: जहाँ तप और ध्यान किया जाता है, वहाँ पवित्रता स्वतः प्राप्त होती है।
पदयात्रा को तपस्या के समान माना गया है, क्योंकि इसमें आत्मसंयम, साधना और निरंतर भक्ति निहित होती है।
महाभारत (वनपर्व, अध्याय 82, श्लोक 8–9):
"पद्भिः तीर्थानि गन्तव्यं स्नात्वा धर्मफलप्रदम्।
दर्शनात् पापसंहारं तीर्थयात्रा कृता भवेत्॥"
अर्थ: तीर्थों की पदयात्रा से पुण्य प्राप्त होता है, स्नान से धर्म की सिद्धि होती है और दर्शन से पापों का नाश होता है।
महाभारत (अनुशासन पर्व, 106.28):
"पुण्यानि तीर्थानि समाससाद्य, भुक्त्वा च तेषां फलमद्भुतानि।"
अर्थ: तीर्थ यात्रा और वहाँ की साधना से अद्भुत पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
गरुड़ पुराण (पूर्व खंड, अध्याय 106, श्लोक 7–8):
"गङ्गादि तीर्थेषु पदयात्रा कृत्वा, सर्वपापं विनश्यति।"
अर्थ: गंगा एवं अन्य तीर्थों की पदयात्रा करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है।
यह श्लोक दर्शाता है कि पदयात्रा आत्मशुद्धि का सर्वोत्तम साधन है।
स्कंद पुराण (काशी खंड, अध्याय 26, श्लोक 32):
"यः पद्भिः काशिं याति स सर्वपापविमुक्तः।"
अर्थ: जो व्यक्ति पैदल काशी की यात्रा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
पदयात्रा को यहाँ मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया है।
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