
हिंदू धर्म में संकल्प की परंपरा अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण है। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश स्वयं पूजा, यज्ञ, पाठ या तीर्थ यात्रा जैसे कार्यों को करने में असमर्थ हो, तो वह संकल्प के माध्यम से किसी ब्राह्मण, परिवारजन या अन्य योग्य व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर सकता है। यह प्रतिनिधि उस धार्मिक कार्य को संकल्पकर्ता की ओर से पूर्ण करता है, और फल उसी को प्राप्त होता है।
यदि कोई व्यक्ति रामायण पाठ करवाना चाहता है, परंतु स्वयं लंबे समय तक बैठने या अनुष्ठान में शामिल होने में असमर्थ है, तो वह संकल्प लेकर किसी ब्राह्मण को यह कार्य सौंप सकता है। इस प्रकार वह व्यक्ति, स्वयं उपस्थित न होते हुए भी, उस पूजन का पुण्य प्राप्त करता है।
भावार्थ: जो व्यक्ति बिना संकल्प के कोई भी धार्मिक कार्य करता है, उसे बहुत ही अल्प फल प्राप्त होता है और धर्म की शक्ति भी क्षीण हो जाती है।
भावार्थ: सभी यज्ञ, व्रत और धर्म के कार्य संकल्प पर आधारित होते हैं। संकल्प ही इन सबका मूल है।
निर्णय सिंधु, धर्मसिंधु आदि ग्रंथों में भी संकल्प की विधि एवं उसकी महत्ता का विस्तार से वर्णन मिलता है। प्राचीन काल में ब्राह्मणजन राजा, क्षत्रिय, व्यापारी एवं अन्य समाज के व्यक्तियों के स्थान पर संकल्प विधि द्वारा यज्ञ, पूजन और तीर्थ यात्राएँ संपन्न करते थे।
संकल्प केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, अपितु श्रद्धा, निष्ठा और अधिकार के हस्तांतरण का आध्यात्मिक माध्यम है। यह परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी प्राचीन काल में थी – विशेषकर उन लोगों के लिए जो शारीरिक, मानसिक या सामाजिक कारणों से स्वयं धार्मिक कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ हैं।
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